नीतियां लील गईं हथकरघे का ताना-बानाDec 10, 02:00 amबताएं
Twitter Delicious Facebook वाराणसी : काशी हिंदू विश्वविद्यालय के सामाजिक विज्ञान संकाय स्थित इतिहास विभाग में गुरुवार को हथकरघा व बुनकरों पर विमर्श किया गया। 'बुनकरों के ताने-बाने एवं सामुदायिक एवं लैंगिक पहचान' विषयक इस विमर्श में वक्ताओं का कहना था कि सरकारी नीतियों ने बुनकरों को बेहाल कर दिया। उनकी रोजी-रोजी पर झटके-दर-झटके पड़ने लगे। कितनों ने इस परंपरागत कारोबार से ही नाता तोड़ लिया। इसका कारण था पॉवरलूम को बढ़ावा देना। इस बढ़ावे के चलते बुनकरों की आर्थिक स्थिति विकट हुई। उनकी समाजिक, आर्थिक स्थिति में सुधार के लिए गंभीर पहल की जरूरत है।
बतौर मुख्य अतिथि सेंटर फॉर वूमेंस डेवलपमेंट स्टडीज नई दिल्ली की प्रो. वासंती रामन ने कहा कि बुनकरी के काम में हिंदू व मुसलमान दोनों समुदायों के लोग ताने-बाने की तरह ही जुड़े हुए हैं। सरकारी नीतियों ने पावरलूम को बढ़ावा दिया। सरकारों ने भी हथकरघा उद्योग के विकास के प्रति गहरी रुचि नहीं ली। और तो और वैश्वीकरण चलते तो हथकरघा उद्योग के अस्तित्व को बचाने का संकट खड़ा हो गया। हथकरघा में औरत व मर्द दोनों का ही सामंजस्य था पर आज हुनरमंद हाथ खाली हो गए है या होते जा रहे हैं। अध्यक्षता करते हुए विभागाध्यक्ष प्रो. लक्ष्मण राय ने कहा कि महाजन आदि भी हथकरघा उद्योग के खात्मे व बुनकरों की बदहाली के लिए जिम्मेदार हैं। बुनकरों को महाजनों व गिरस्ताओं के शोषण से मुक्त करना होगा तभी स्थिति सुधरेगी। कार्यक्रम में प्रो. दीपक मलिक ने भी भागीदारी की। डॉ. घनश्याम, डॉ. रंजनाशील, डॉ. बिंदा परांजपे, प्रो. आरपी सिंह, मालविका पांडेय, ताबिर कलाम, अनुराधा सिंह, आदि उपस्थित थीं।
No comments:
Post a Comment